सुनहरा सफ़र - आध्यात्म की ओर ...
सुनहरा सफ़र - आध्यात्म की ओर ...
सोचो अगर अपना आज जाना पहचाना लगे सोचो अगर अपना कल बेहद सुहाना दिखे सोचो अगर जीवन की डोर अपने हाथ में हो सोचो अगर परिवार और ख़ुशियाँ सब साथ में हों
"मोहनीचिड़िया"
इक था मोहन ... और इक थी उसकी चिड़िया..
मोहन जो बिन कहे, बहुत कुछ कहता था.. और वो चिड़िया चुप-चाप सी, सहमी सी, सब सुन लेती थी ..
धीरे-धीरे मौन से चलता हुआ ये सफ़र, दिल की कहानी बन गया। ज़िंदगी के सभी सवालों का जवाब बन गया, जवाब बनकर औरों को भी देने वाला सुनहरा ख़्वाब बन गया।
काश!
उन सभी परिंदों 🕊️को
इक पल में रेहा करा सकूँ ;
जो किसी अनचाही सी क़ैद के चलते
अपने पंख भूल बैठे हैं!